roz mujh ko tabaah karte hain | रोज़ मुझ को तबाह करते हैं

  - Sohil Barelvi

रोज़ मुझ को तबाह करते हैं
कुछ तो आसेब मुझ में ऐसे हैं

दूर जाता नहीं हूँ तुझ सेे यूँँ
दूर कब जाने वाले लौटे हैं

जाने वालों को हम नहीं रोते
जाने वाले पराए होते हैं

चारागर भी दवा करे कब तक
अब तो ज़ख़्मों से ज़ख़्म रिसते हैं

मैंने बचपन कभी नहीं देखा
मेरे औज़ार ही खिलौने हैं

आपके दुख पे मैं नहीं रोता
आप क्यूँँ मेरे दुख पे रोते हैं

मैं हूँ महरूम इक ज़माने से
ख़ैर तू ने तो अपने देखे हैं

ऐसा महसूस हो रहा सोहिल
मेरे मरहूम पास बैठे हैं

  - Sohil Barelvi

Ehsaas Shayari

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