वहाँ तक आख़िरश वो ले गया था
जहाँ जाने से मैं कतरा रहा था
जहाँ पर कम बहुत कम बोलना था
वहाँ पर मैं ज़ियादा बोलता था
तुझे तो याद होगा क्या बताऊँ
तेरी महफ़िल से क्यूँँ उठ कर गया था
सभी ख़तरे से बाहर हो चुके थे
मुझे अपने लिए भी सोचना था
वही है ना तू हम-दम कल तलक जो
मुझे ख़ुश देख कर ख़ुश हो रहा था
पराया कर दिया उस ने भी इक दिन
मुझे जो शख़्स अपना सा लगा था
ख़िज़ाँ के दिन में वो दिन याद आए
परिंदों से हमारा राब्ता था
ये राह-ए-इश्क़ है वाक़िफ़ हूँ इस से
इसी रह पर मैं मुँह के बल गिरा था
गुज़िश्ता साल जाते जाते सोहिल
जिगर को और भारी कर गया था
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