कोई अपनी ख़ुशी और ज़िंदगी में लीन रहता है
कोई अपनी उदासी खा़मुशी में लीन रहता है
सभी को चाहिए रौशन ज़हाँ और रौशनी अपनी
मगर इक शख़्स है जो तीरगी में लीन रहता है
वो तन्हाई में अक्सर शे'र कहता और ग़ज़ल लिखता
बहुत तन्हा है वो सो शायरी में लीन रहता है
उसे भी कर रखा है घर की ज़िम्मेदारियों ने तंग
वो शायद इसलिए अब नौकरी में लीन रहता है
किसी को दिल लगाने से नहीं मिलती है फ़ुर्सत और
कोई कोई तो केवल दिल्लगी में लीन रहता है
उसे क्या इल्म उसको कैसे और क्यूँ शहर भेजा है
पढ़ाई छोड़ वो तो आशिक़ी में लीन रहता है
उसे क्या फ़र्क पड़ता होगा इस ज़ालिम ज़माने से
वो तो अपनी अना और बे-दिली में लीन रहता है
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