ज़हर से ज़हर कटे काँटे से किरची निकले

  - Vibha Jain 'Khwaab'

ज़हर से ज़हर कटे काँटे से किरची निकले
दे नया दर्द कि ये टीस पुरानी निकले

ज़िंदगी यूँ तो नया लफ़्ज़ नहीं है लेकिन
वक़्त के साथ नए इस के म'आनी निकले

क्यूँ कोई कोख जो सूनी हो वो शर्मिंदा हो
क्या ज़रूरी है कि हर सीप से मोती निकले

इश्क़ की झील में उतरो तो सँभल कर उतरो
ऐन मुमकिन है ये उम्मीद से गहरी निकले

एक वो शख़्स जिसे दिल ने ख़ुदा जाना हो
सोचिए क्या हो अगर वो भी फ़रेबी निकले

छटपटाते हैं उदासी से निकलने को मगर
क़ैद-ए-सय्याद से कैसे कोई पँछी निकले

वो तरीक़ा मुझे मरने का बताओ जिस से
ख़ुदकुशी भी न लगे जान भी जल्दी निकले

  - Vibha Jain 'Khwaab'

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