gham koii doosra pasand nahin | ग़म कोई दूसरा पसंद नहीं

  - Viru Panwar

ग़म कोई दूसरा पसंद नहीं
कुछ भी तुझ से जुदा पसंद नहीं

तू कि समझे न समझे पर मुझ को
कोई तेरे सिवा पसंद नहीं

की नहीं उस ने मुझ से बात कभी
सो मुझे बोलना पसंद नहीं

वो अगर पूछता तो बतलाता
क्या है और मुझ को क्या पसंद नहीं

इंतिहाई पसंद है वो मुझे
मैं कि जिस को ज़रा पसंद नहीं

साँस जिस में न ली कभी तुम ने
मुझ को ऐसी हवा पसंद नहीं

जो नहीं जाता तेरे घर की तरफ़
मुझ को वो रास्ता पसंद नहीं

उस ने ठुकराया तो समझ आया
क्यूँँ हवा को दिया पसंद नहीं

उस ने बीमार कर के छोड़ दिया
मुझ को तब से दवा पसंद नहीं

सुनने वाले पे क्या नहीं गुज़री
तुम ने तो कह दिया पसंद नहीं

  - Viru Panwar

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