moti dhoondhaa aur na gauhar dhoondhaa | मोती ढूँढा और न गौहर ढूँढा

  - Viru Panwar

मोती ढूँढा और न गौहर ढूँढा
आँखों ने बस तेरा मंज़र ढूँढा

वो भी दुनिया जैसा निकला जिस को
दुनिया की नज़रों से छुप कर ढूँढा

तुम मेरे दिल के ही अंदर तो थे
तुम ने लेकिन ख़ुद को बाहर ढूँढा

उस को पहली बार जहाँ देखा था
उसी जगह पे उस को अक्सर ढूँढा

पहले ढूँढा उस के दीवानों को
और फिर उन सब की ख़ातिर घर ढूँढा

ख़ैर नहीं था मैं ही उस के क़ाबिल
ख़ुश हूँ उस ने मुझ से बेहतर ढूँढा

काश उस ने मुझ को यूँँ ढूँढा होता
नदियों ने जिस तरह समुंदर ढूँढा

सुब्ह हुई तो तुम ने भी मेरे शाइर
छोड़ सुकून-ए-दिल को दफ़्तर ढूँढा

  - Viru Panwar

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