kyun khud ko tu rakhta hai yuñ patthar sa banaa kar | क्यूँ ख़ुद को तू रखता है यूँँ पत्थर सा बना कर

  - Wajid Husain Sahil

क्यूँ ख़ुद को तू रखता है यूँँ पत्थर सा बना कर
चल बज़्म में यारों की कभी हँस भी लिया कर

वो दिल न चुरा ले कहीं सीने से लगा कर
तू हल्क़ा-ए-याराँ में भी मोहतात रहा कर

तेरे सिवा कोई भी दिखाई न दे मुझको
या रब मिरी आँखों को सिफ़त ऐसी अता कर

वो शख़्स जो नज़रों से बहुत दूर है लेकिन
पहरो उसे तकता हूँ मैं ख़्वाबों में बुला कर

दिल से मिरी यादों का मिटाना तो अलग बात
नंबर ही मिरा फ़ोन से दिखला दे मिटा कर

साहिल जिसे कहते हैं तकी़ मीर भी भारी
देखूँगा किसी रोज़ वो पत्थर भी उठा कर

  - Wajid Husain Sahil

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