गर तेरा दर खुला नहीं होता

फिर कोई आसरा नहीं होता

तब भी कश्ती ख़ुदा चलाता है
जब कोई ना-खु़दा नहीं होता

बीच का कोई रास्ता ही नहीं
प्यार होता है या नहीं होता

दिल से कहता हूँ मैं, मिरा हो जा
पर वो कहता है जा, नहीं होता

अक़्ल ये बार-बार कहती है
दिल किसी का सगा नहीं होता

मत कहीं ढूँढ़ जा के खु़शहाली
माँ के क़दमों में क्या नहीं होता

आओ उल्फ़त जहान में बाँटें
नफ़रतों से भला नहीं होता

मर के भी मुल्क की वफा़ओं का
क़र्ज़ हम से अदा नहीं होता

नर्म लहजे में बात करने से
काम दुनिया में क्या नहीं होता

फिर नवाफ़िल का ज़िक्र क्या 'साहिल'
फ़र्ज़ तुझ से अदा नहीं होता

— Wajid Husain Sahil

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