दिन ही कटता नहीं फिर रात की पहनाई है
ये सलासिल मुझे किस बात की पहनाई है
खा़ली ज़ेहनों में किताबों की शुआएँ भर कर
रौशनी इक नए जज़्बात की पहनाई है
माह-ए-कामिल को अमावस में मुबद्दल कर के
किसने चादर शब-ए-जु़ल्मात की पहनाई है
हाकिम-ए-वक़्त न इतरा के ये तौकी़र तुझे
तेरी तक़दीर ने खै़रात की पहनाई है
अब कुल्हाड़ी से करे भी तो शजर क्या शिकवा
ज़र्ब तो अपने ही हम-जा़त की पहनाई है
पहले दुश्मन की तरह ज़ख्म दिए पै-दर-पै
फिर ज़िमाद उसने मुसाफा़त की पहनाई है
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