din hi katata nahin phir raat ki pahnaai hai | दिन ही कटता नहीं फिर रात की पहनाई है

  - Wajid Husain Sahil

दिन ही कटता नहीं फिर रात की पहनाई है
ये सलासिल मुझे किस बात की पहनाई है

खा़ली ज़ेहनों में किताबों की शुआएँ भर कर
रौशनी इक नए जज़्बात की पहनाई है

माह-ए-कामिल को अमावस में मुबद्दल कर के
किसने चादर शब-ए-जु़ल्मात की पहनाई है

हाकिम-ए-वक़्त न इतरा के ये तौकी़र तुझे
तेरी तक़दीर ने खै़रात की पहनाई है

अब कुल्हाड़ी से करे भी तो शजर क्या शिकवा
ज़र्ब तो अपने ही हम-जा़त की पहनाई है

पहले दुश्मन की तरह ज़ख्म दिए पै-दर-पै
फिर ज़िमाद उसने मुसाफा़त की पहनाई है

  - Wajid Husain Sahil

Shikwa Shayari

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