गिरते-पड़ते ख़ुद ही मंज़िल पा गया
ठोकरें खाईं तो चलना आ गया
कल अचानक आ के मेरे सामने
दिल मेरा वो ज़ोर से धड़का गया
क्या हुआ जो वो न मुझ को मिल सका
ज़ीस्त में ग़म का मज़ा तो आ गया
बा'द मुद्दत के मिली उन से नज़र
और इन आँखों में पानी आ गया
दूसरों के ऐब गिनता था बहुत
आइना देखा तो खु़द शरमा गया
इश्क़ में 'साहिल' जुदाई शर्त है
दिल को कोई आ के ये समझा गया
— Wajid Husain Sahil















