इस सेे पहले कि बिछड़ने का इरादा कर लें

आओ हम ज़िक्र मुहब्बत का ज़्यादा कर लें

बिन पिए भी तो शब-ए-हिज्र गुज़र सकती है
क्या ज़रूरी है कि सर तोहमत-ए-बादा कर लें

ये भी हो सकता है वो ख़ुद में सिमटकर आएँ
हम भी मुमकिन है कि आग़ोश कुशादा कर लें

हम को मलबूस-ए-सुकूनत तो नहीं होगा नसीब
रास्ते की ही थकन तन का लिबादा कर लें

दश्त-ए-वहशत में भी मुमकिन है कि नींद आ जाए
गर्द को शाल जो पत्थर को विसादा कर लें

हम फ़क़ीरों को जहाँ वालों ने समझा क्या है
बादशाहों को भी चाहें तो पियादा कर लें

मुझ को उस हाथ पे दिल रखना था मैं रख आया
अब वो चाहें तो मेरे दिल का बुरादा कर लें

— Amaan Haider

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