अहल-ए-दुनिया के लिए दर्स बनाया गया मैं
'इश्क़ कर बैठा था, सूली पे चढ़ाया गया मैं
कहके दीवाना मुझे लोगों ने मारे पत्थर
'इश्क़ में क़ैस तेरे जैसा सताया गया मैं
एक भी मर्तबा खिड़की से नहीं झाँका वो
मुद्दतों कूचा-ए-महबूब में आया गया मैं
पाँव में छाले हैं और छालों में काँटे पैवस्त
इस क़दर दश्त-ए-अज़िय्यत में फिराया गया मैं
ज़िन्दगी थी तो सभी ने नज़र अंदाज़ किया
मौत के बा'द कलेजे से लगाया गया मैं
ये मेरा ख़्वाब न हो जाए हक़ीक़त, डर है
ठोकरें खाता हुआ दश्त में पाया गया मैं
रूठता नइँ था मगर रूठा तो ऐसा रूठा
मिन्नतें की गईं लेकिन न मनाया गया मैं
मैंने आना तो न था शहर-ए-मोहब्बत में 'अमान'
क्या करूँँ यार अगर खींच के लाया गया मैं
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