ZafarAli Memon

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    चाय भी हो, हाथ भी हो उसका मेरे हाथ में
    मुझको जन्नत चाहिए और वो भी उसके साथ में
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    सर पटक के रो रहा हूँ मैं गुज़िश्ता रात से
    छोड़ जाने को कहा था उसने मुझसे ख़्वाब में
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    ताजमहल फीका लगता था
    जब तक तू उसके आगे थी
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    तुम हो मेरा प्यारा गुड्डा
    दिल में रहने वाला गुड्डा

    तुम लट्टू हो मेरे ऊपर
    मैं पागल मतवाला गुड्डा

    तुम जैसे चंदा पूनम के
    मैं चमकीला तारा गुड्डा

    बाज़ी जीतूँ मैं हर इक से
    तुम पर आ के हारा गुड्डा

    जन्नत में जब साथी देना
    दे देना दोबारा गुड्डा

    तुम कहते हो मुझ-को 'ज़फ़्फू'
    मैं कहता हूँ प्यारा गुड्डा
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    आसाँ है मिट्टी से मिट्टी पे मिट्टी लिखना
    मुश्किल है इक-तरफ़ा चाहत में चिट्ठी लिखना
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    "ख़ुदा नाराज़"
    कमाल है कमाल है
    मज़हब की बात पर
    क्यूँ उठ रहे सवाल है

    बेहाल है बेहाल है
    सब मकड़ियों के जाल है
    दुनिया में रहना भी अब
    बहुत बड़ा जंजाल है

    बवाल है बवाल है
    गुज़र रही जो ज़िंदगी
    यह दिन है या कोई साल है
    मुझे आज की फ़िक्र तो है
    मुझे कल का भी ख़याल है

    नक़ाब है नक़ाब है
    हर चेहरे पर नक़ाब है
    जो शख़्स की यह ज़ात है
    वह साँप का भी बाप है
    जो दो-रुख़ा किरदार है
    ग़ज़ब है बे-मिसाल है

    दलाल है दलाल है
    सब सोच के दलाल है
    गुनाह भी उसका माफ़ है
    सब पैसे की यह चाल है

    क्या काल है क्या काल है
    ख़ुदा भी जो नाराज़ है
    'इबादतों में मिल रहे
    जल्दबाज़ी के आ'माल है

    ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा
    मज़हब की बात पर
    क्यूँ उठ रहे सवाल है

    कमाल है कमाल है
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    "कोई नहीं समझता"
    कोई बात नहीं समझता
    कोई जज़्बात नहीं समझता

    कोई समझ लेता है ख़्वाबों को
    पर कोई रात नहीं समझता

    कोई दूरी निभाना जानता है
    पर कोई साथ नहीं समझता

    कोई बग़ैर देखे चुन लेता है साथी
    पर कोई ज़ात-पात नहीं समझता

    कोई जान लेता है झूठी हँसी
    पर कोई हालात नहीं समझता

    कोई बात नहीं समझता
    तो कोई जज़्बात नहीं समझता
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    "मशवरा"
    बदलेंगे लोग बदलेंगे उनके तेवर भी
    जाने अनजाने में हर तेवर समझता हूँ

    मैं अपने अलफ़ाज़ को दिल-ओ-दिमाग़ से लिखता हूँ
    दिल टूटा आशिक़ हूँ हर रंग को परखता हूँ

    अपनी उन हरकत और बे-वजह प्यार पर
    होने पर एक शाम ख़ुद में कहीं खटकता हूँ

    तस्वीर को देख कर तेरी ले कर तेरा नाम
    उन पुरानी याद में हर रोज़ कहीं भटकता हूँ

    तेरी सब चीज़ और सब तोहफ़ों को
    ख़ूब उनहें सँवार कर और सँभाले रखता हूँ

    भूल कर तुझ को अपने मन से रद्द करके तेरी यादें
    शुरू करने एक नई ज़िंदगी सुब्ह-सवेरे निकलता हूँ

    बेवफ़ा मैं न तुझे कहूँगा न ही ख़ुद को मतलबी
    रहो हमेशा तुम ख़ुशहाल मिन्नतें इस की करता हूँ

    मशवरा-ए-ज़फ़र सुन लो दोस्तों
    आज मैं तुम को कहता हूँ

    पहले राज़ी वालिदैन को बाद ही इश्क़ करना
    रोज़ ऐसे कितने आशिक़ों मैं देखता बिछड़ता हूँ
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    "बन्दा और ख़ुदा"
    एक मुख़्तसर सी कहानी है
    जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है

    ये हुकूमत आसमानी है
    हर मख़्लूक़ रूहानी है

    ये ख़ुदा की मेहरबानी है
    की सज्दों में झुकती पेशानी है

    ये सारी दुनिया फ़ानी है
    हर शख़्स को मौत आनी है

    ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है
    हर शख़्स की ढलती जवानी है

    क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा
    ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है

    ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है
    की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है
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    ZafarAli Memon
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    "तुम हो"
    तुम सुकून हो पुर-सुकून हो
    मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

    मैं होश में बाहोश में
    मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो

    तुम सर्द हो बरसात भी
    मिरी गर्मियों की तुम जून हो

    तुम ग़ज़ल हो हो तुम शाइरी
    मिरी लिखी नज़्म की धुन हो

    मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम
    मिरे इस हयात की मम्नून हो

    तुम धूप हो मिरी छाँव भी
    तुम सियाह रात का मून हो

    तुम सिन हो तुम काफ़ भी
    तुम वाओ के बाद की नून हो

    तुम सुकून हो पुर-सुकून हो
    मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो
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    ZafarAli Memon
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