गुफ़्तम कि मुख तिरा क्या गुफ़्ता सुरज सूँ बेहतर
गुफ़्तम कि कान का दर गुफ़्ता कि बह ज़ अख़्तर
गुफ़्तम दहान-ओ-रूयत गुफ़्ता कि ग़ुंचा-ओ-गुल
गुफ़्तम कपोल का ख़ाल गुफ़्ता कि क़ुर्स-ए-अम्बर
गुफ़्तम कि चश्म-ए-जादू गुफ़्ता कि दोनों ख़ंजर
गुफ़्तम धड़ी लबाँ की गुफ़्त अज़ अक़ीक़ बेहतर
गुफ़्तम कपोल तेरे गुफ़्ता कि बर्ग-ए-लाला
गुफ़्तम कि बोसा तुझ लब गुफ़्ता कि बह ज़ शक्कर
गुफ़्तम कि भौंहा तेरी गुफ़्ता हिलाल दोनों
गुफ़्तम कि ज़ुल्फ़ तेरी गुफ़्ता कि सुंबुल-ए-तर
गुफ़्तम गदा हूँ तेरा गुफ़्ता सही मुनासिब
गुफ़्तम असीर तुझ कूँ गुफ़्ता तमाम किश्वर
गुफ़्तम कि क़द तुम्हारा गुफ़्ता कि सर्व-ए-तन्नाज़
गुफ़्तम कि दिल तिरा क्या गुफ़्ता कि सख़्त पत्थर
गुफ़्तम अदा-ओ-ग़म्ज़ा गुफ़्ता बला-ए-जाँ-हा
गुफ़्तम इताब-ओ-क़हरत गुफ़्ता कि हौल-ए-महशर
गुफ़्तम कि 'फ़ाएज़' आया गुफ़्ता कि ख़ैर-मक़्दम
गुफ़्तम कुजास्त जा-अश गुफ़्ता कि बर-सर-ए-दर
जागीर अगर बहुत न मिली हम कूँ ग़म नहीं
हासिल हमारे मुल्क-ए-क़नाअ'त का कम नहीं
इस साथ मह-रुख़ाँ को नहीं कुछ बराबरी
यूसुफ़ से ये निगार-ए-परी-ज़ाद कम नहीं
ख़ुश-सूरताँ से क्या करूँ मैं आश्नाई अब
मुझ को तो इन दिनों में मयस्सर दिरम नहीं
दिल बाँधते नहीं हैं हमारे मिलाप पर
मह-तलअताँ में मुझ को तो अब कुछ भरम नहीं
मिलते हो सब के जा के घर और हम सूँ हो कनार
कुछ हम तो उन चकोरों से ऐ माह कम नहीं
ज़ाहिर के दोस्त आते नहीं काम वक़्त पर
तलवार काट क्या करे जिस को जो दम नहीं
'फ़ाएज़' को भाया मिस्रा-ए-'यकरंग' ऐ सजन
गर तुम मिलोगे उन सेती देखोगे हम नहीं
मिरा महबूब सब का मन हरन है
नज़र कर देख वो आहू नैन है
नहीं अब जग में वैसा और साजन
मुझे सूरत-शनासी बीच फ़न है
सबी दीवाने हैं उस मह-लक़ा के
मगर वो दिल-रुबा जादू नयन है
करे रश्क-ए-गुलिस्ताँ दिल को 'फ़ाएज़'
मिरा साजन बहार-ए-अंजुमन है
एक पल जा न कहूँ नैन सूँ ऐ नूर-ए-बसर
टुक न हो इस दिल-ए-तारीक सूँ ऐ बद्र बदर
तेरी इस सुब्ह बिना गोश-ओ-ख़त-ए-मुश्कीं सूँ
सैर करता हूँ अजब शाम-ओ-सहर शाम-ओ-सहर
जल के मैं सुर्मा हुआ बल्कि हुआ काजल भी
ख़ाना-ए-चश्म में तुझ पाऊँ जो टुक राह मगर
राह-दाराँ लेवें हर गाम में जीव का हासिल
हैगा इस राह में ऐ उम्र-ए-अबद जाँ का ख़तर
क़िबले सूँ मूँह फिराया तिरे मुख की जानिब
किया ज़ाहिद ने मके सूँ सू-ए-बुत-ख़ाना सफ़र
चाँद सूरज की रख ऐनक कूँ सदा पीर-ए-फ़लक
ख़म हो करता है नज़र ताकि देखे तेरी कमर
मुझ पास कभी वो क़द-ए-शमशाद न आया
इस घर मने वो दिल-बर-ए-उस्ताद न आया
गुलशन मिरी अँखियाँ में लगे गुलख़न-ए-दोज़ख़
जो सैर को मुझ साथ परी-ज़ाद न आया
साँझ आई दियो दिन बी हुआ फ़िक्र में आख़िर
वो दिल-बर-ए-जादूगर-ओ-सय्याद न आया
आया न हमन पास किया वा'दा-ख़िलाफ़ी
'फ़ाएज़' का कुछ अहवाल मगर याद न आया
मेरी जाँ वो बादा-ख़्वारी याद है
वक़्त-ए-मस्ती गिर्या-ज़ारी याद है
मोतिया का हार ओ चम्पा की छड़ी
जोड़ा-ए-दामन-किनारी याद है
सब अभूकन तेरे तन पर ख़ुशनुमा
ख़ूबी-ए-अंगिया ओ सारी याद है
अब्र का साया ओ सब्ज़ा राह का
जान-ए-मन रथ की सवारी याद है
कोयलां के नाले अमराई के बीच
उस समय की बे-क़रारी याद है
मेंह बी तो टपकता था बूँद बूँद
'फ़ाएज़' उस दिन की सवारी याद है
यार मेरा मियान-ए-गुलशन है
ग़र्क़-ए-ख़ूँ फूल ता-ब-दामन है
दिल लुभाता है सब का वो साजन
दिल-फ़रेबी में उस को क्या फ़न है
तारे जिऊँ दर है जिस के हल्क़ा-ब-गोश
वो बिना गोश सुब्ह-ए-रौशन है
उस नज़ारे से सब शहीद हुए
वो नयन क्या बला-ए-रह-ज़न है
क्या बयाँ कर सकूँ मैं गत उस की
'फ़ाएज़' अत ख़ुश-अदा सिरीजन है
तिरी गाली मुझ दिल को प्यारी लगे
दुआ मेरी तुझ मन में भारी लगे
तदी क़द्र-ए-आशिक़ की बूझे सजन
किसी साथ अगर तुझ कूँ यारी लगे
भुला देवे वो ऐश-ओ-आराम सब
जिसे ज़ुल्फ़ सीं बे-क़रारी लगे
नहीं तुझ सा और शोख़ ऐ मन हिरन
तिरी बात दिल को न्यारी लगे
भवाँ तेरी शमशीर ज़ुल्फ़ाँ कमंद
पलक तेरी जैसे कटारी लगे
हुए सर्व बाज़ार दामन का देख
अगर गर्द-ए-दामन कनारी लगे
न जानूँ तू साक़ी था किस बज़्म का
नयन तेरी मुझ कूँ ख़ुमारी लगे
वही क़द्र 'फ़ाएज़' की जाने बहुत
जिसे इश्क़ का ज़ख़्म कारी लगे
बे-सबब हम से जुदाई न करो
मुझ से आशिक़ से बुराई न करो
ख़ाकसाराँ को न करिए पामाल
जग में फ़िरऔं सी ख़ुदाई न करो
बे-गुनाहाँ कूँ न कर डालो क़त्ल
आह कूँ तीर-ए-हवाई न करो
एक दिल तुम से नहीं है राज़ी
जग में हर इक सूँ बुराई न करो
महव है 'फ़ाएज़'-ए-शैदा तुम पर
उस से हर लहज़ा बखाई न करो