Faez Dehlvi

Top 10 of Faez Dehlvi

    गुफ़्तम कि मुख तिरा क्या गुफ़्ता सुरज सूँ बेहतर
    गुफ़्तम कि कान का दर गुफ़्ता कि बह ज़ अख़्तर

    गुफ़्तम दहान-ओ-रूयत गुफ़्ता कि ग़ुंचा-ओ-गुल
    गुफ़्तम कपोल का ख़ाल गुफ़्ता कि क़ुर्स-ए-अम्बर

    गुफ़्तम कि चश्म-ए-जादू गुफ़्ता कि दोनों ख़ंजर
    गुफ़्तम धड़ी लबाँ की गुफ़्त अज़ अक़ीक़ बेहतर

    गुफ़्तम कपोल तेरे गुफ़्ता कि बर्ग-ए-लाला
    गुफ़्तम कि बोसा तुझ लब गुफ़्ता कि बह ज़ शक्कर

    गुफ़्तम कि भौंहा तेरी गुफ़्ता हिलाल दोनों
    गुफ़्तम कि ज़ुल्फ़ तेरी गुफ़्ता कि सुंबुल-ए-तर

    गुफ़्तम गदा हूँ तेरा गुफ़्ता सही मुनासिब
    गुफ़्तम असीर तुझ कूँ गुफ़्ता तमाम किश्वर

    गुफ़्तम कि क़द तुम्हारा गुफ़्ता कि सर्व-ए-तन्नाज़
    गुफ़्तम कि दिल तिरा क्या गुफ़्ता कि सख़्त पत्थर

    गुफ़्तम अदा-ओ-ग़म्ज़ा गुफ़्ता बला-ए-जाँ-हा
    गुफ़्तम इताब-ओ-क़हरत गुफ़्ता कि हौल-ए-महशर

    गुफ़्तम कि 'फ़ाएज़' आया गुफ़्ता कि ख़ैर-मक़्दम
    गुफ़्तम कुजास्त जा-अश गुफ़्ता कि बर-सर-ए-दर

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    जागीर अगर बहुत न मिली हम कूँ ग़म नहीं
    हासिल हमारे मुल्क-ए-क़नाअ'त का कम नहीं

    इस साथ मह-रुख़ाँ को नहीं कुछ बराबरी
    यूसुफ़ से ये निगार-ए-परी-ज़ाद कम नहीं

    ख़ुश-सूरताँ से क्या करूँ मैं आश्नाई अब
    मुझ को तो इन दिनों में मयस्सर दिरम नहीं

    दिल बाँधते नहीं हैं हमारे मिलाप पर
    मह-तलअताँ में मुझ को तो अब कुछ भरम नहीं

    मिलते हो सब के जा के घर और हम सूँ हो कनार
    कुछ हम तो उन चकोरों से ऐ माह कम नहीं

    ज़ाहिर के दोस्त आते नहीं काम वक़्त पर
    तलवार काट क्या करे जिस को जो दम नहीं

    'फ़ाएज़' को भाया मिस्रा-ए-'यकरंग' ऐ सजन
    गर तुम मिलोगे उन सेती देखोगे हम नहीं

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    मिरा महबूब सब का मन हरन है
    नज़र कर देख वो आहू नैन है

    नहीं अब जग में वैसा और साजन
    मुझे सूरत-शनासी बीच फ़न है

    सबी दीवाने हैं उस मह-लक़ा के
    मगर वो दिल-रुबा जादू नयन है

    करे रश्क-ए-गुलिस्ताँ दिल को 'फ़ाएज़'
    मिरा साजन बहार-ए-अंजुमन है

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    एक पल जा न कहूँ नैन सूँ ऐ नूर-ए-बसर
    टुक न हो इस दिल-ए-तारीक सूँ ऐ बद्र बदर

    तेरी इस सुब्ह बिना गोश-ओ-ख़त-ए-मुश्कीं सूँ
    सैर करता हूँ अजब शाम-ओ-सहर शाम-ओ-सहर

    जल के मैं सुर्मा हुआ बल्कि हुआ काजल भी
    ख़ाना-ए-चश्म में तुझ पाऊँ जो टुक राह मगर

    राह-दाराँ लेवें हर गाम में जीव का हासिल
    हैगा इस राह में ऐ उम्र-ए-अबद जाँ का ख़तर

    क़िबले सूँ मूँह फिराया तिरे मुख की जानिब
    किया ज़ाहिद ने मके सूँ सू-ए-बुत-ख़ाना सफ़र

    चाँद सूरज की रख ऐनक कूँ सदा पीर-ए-फ़लक
    ख़म हो करता है नज़र ताकि देखे तेरी कमर

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    मुझ पास कभी वो क़द-ए-शमशाद न आया
    इस घर मने वो दिल-बर-ए-उस्ताद न आया

    गुलशन मिरी अँखियाँ में लगे गुलख़न-ए-दोज़ख़
    जो सैर को मुझ साथ परी-ज़ाद न आया

    साँझ आई दियो दिन बी हुआ फ़िक्र में आख़िर
    वो दिल-बर-ए-जादूगर-ओ-सय्याद न आया

    आया न हमन पास किया वा'दा-ख़िलाफ़ी
    'फ़ाएज़' का कुछ अहवाल मगर याद न आया

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    मेरी जाँ वो बादा-ख़्वारी याद है
    वक़्त-ए-मस्ती गिर्या-ज़ारी याद है

    मोतिया का हार ओ चम्पा की छड़ी
    जोड़ा-ए-दामन-किनारी याद है

    सब अभूकन तेरे तन पर ख़ुशनुमा
    ख़ूबी-ए-अंगिया ओ सारी याद है

    अब्र का साया ओ सब्ज़ा राह का
    जान-ए-मन रथ की सवारी याद है

    कोयलां के नाले अमराई के बीच
    उस समय की बे-क़रारी याद है

    मेंह बी तो टपकता था बूँद बूँद
    'फ़ाएज़' उस दिन की सवारी याद है

    Faez Dehlvi
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    यार मेरा मियान-ए-गुलशन है
    ग़र्क़-ए-ख़ूँ फूल ता-ब-दामन है

    दिल लुभाता है सब का वो साजन
    दिल-फ़रेबी में उस को क्या फ़न है

    तारे जिऊँ दर है जिस के हल्क़ा-ब-गोश
    वो बिना गोश सुब्ह-ए-रौशन है

    उस नज़ारे से सब शहीद हुए
    वो नयन क्या बला-ए-रह-ज़न है

    क्या बयाँ कर सकूँ मैं गत उस की
    'फ़ाएज़' अत ख़ुश-अदा सिरीजन है

    Faez Dehlvi
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    तिरी गाली मुझ दिल को प्यारी लगे
    दुआ मेरी तुझ मन में भारी लगे

    तदी क़द्र-ए-आशिक़ की बूझे सजन
    किसी साथ अगर तुझ कूँ यारी लगे

    भुला देवे वो ऐश-ओ-आराम सब
    जिसे ज़ुल्फ़ सीं बे-क़रारी लगे

    नहीं तुझ सा और शोख़ ऐ मन हिरन
    तिरी बात दिल को न्यारी लगे

    भवाँ तेरी शमशीर ज़ुल्फ़ाँ कमंद
    पलक तेरी जैसे कटारी लगे

    हुए सर्व बाज़ार दामन का देख
    अगर गर्द-ए-दामन कनारी लगे

    न जानूँ तू साक़ी था किस बज़्म का
    नयन तेरी मुझ कूँ ख़ुमारी लगे

    वही क़द्र 'फ़ाएज़' की जाने बहुत
    जिसे इश्क़ का ज़ख़्म कारी लगे

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    बे-सबब हम से जुदाई न करो
    मुझ से आशिक़ से बुराई न करो

    ख़ाकसाराँ को न करिए पामाल
    जग में फ़िरऔं सी ख़ुदाई न करो

    बे-गुनाहाँ कूँ न कर डालो क़त्ल
    आह कूँ तीर-ए-हवाई न करो

    एक दिल तुम से नहीं है राज़ी
    जग में हर इक सूँ बुराई न करो

    महव है 'फ़ाएज़'-ए-शैदा तुम पर
    उस से हर लहज़ा बखाई न करो

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    अज़ कबीर-ओ-रंग-ए-केसर और गुलाल
    अब्र छाया है सफ़ेद-ओ-ज़र्द-ओ-लाल

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