एक पल जा न कहूँ नैन सूँ ऐ नूर-ए-बसर
टुक न हो इस दिल-ए-तारीक सूँ ऐ बद्र बदर
तेरी इस सुब्ह बिना गोश-ओ-ख़त-ए-मुश्कीं सूँ
सैर करता हूँ 'अजब शाम-ओ-सहर शाम-ओ-सहर
जल के मैं सुर्मा हुआ बल्कि हुआ काजल भी
ख़ाना-ए-चश्म में तुझ पाऊँ जो टुक राह मगर
राह-दाराँ लेवें हर गाम में जीव का हासिल
हैगा इस राह में ऐ उम्र-ए-अबद जाँ का ख़तर
क़िबले सूँ मूँह फिराया तिरे मुख की जानिब
किया ज़ाहिद ने मके सूँ सू-ए-बुत-ख़ाना सफ़र
चाँद सूरज की रख ऐनक कूँ सदा पीर-ए-फ़लक
ख़म हो करता है नज़र ताकि देखे तेरी कमर
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