Meer Taqi Meer

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    क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़
    जान का रोग है बला है इश्क़
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    क्या क्या बैठे बिगड़ बिगड़ तुम पर हम तुम से बनाए गए
    चुपके बातें उठाए गए सर गाड़े वो हैं आए गए

    उट्ठे नक़ाब जहाँ से यारब जिस से तकल्लुफ़ बीच में है
    जब निकले उस राह से हो कर मुँह तुम हम से छुपाए गए

    कब कब तुम ने सच नहीं मानीं झूटी बातें ग़ैरों की
    तुम हम को यूँ ही जलाए गए वे तुम को वो हैं लगाए गए

    सुब्ह वो आफ़त उठ बैठा था तुम ने न देखा सद अफ़्सोस
    क्या क्या फ़ित्ने सर जोड़े पलकों के साए साए गए

    अल्लाह रे ये दीदा-दराई हूँ न मुकद्दर क्यूँके हम
    आँखें हम से मिलाए गए फिर ख़ाक में हम को मिलाए गए

    आग में ग़म की हो के गुदाज़ाँ जिस्म हुआ सब पानी सा
    या'नी बिन इन शोला-रुख़ों के ख़ूब ही हम भी ताए गए

    टुकड़े टुकड़े करने की भी हद एक आख़िर होती है
    कुश्ते उस की तेग़-ए-सितम के गोर तईं कब लाए गए

    ख़िज़्र जो मिल जाता है गाहे आप को भूला ख़ूब नहीं
    खोए गए उस राह के वर्ना काहे को फिर पाए गए

    मरने से क्या 'मीर'-जी-साहब हम को होश थे क्या करिए
    जी से हाथ उठाए गए पर उस से दिल न उठाए गए
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    कोई तुम सा भी काश तुम को मिले
    मुद्दआ हम को इंतिक़ाम से है
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    मक्का गया मदीना गया कर्बला गया
    जैसा गया था वैसा ही चल फिर के आ गया
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    पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
    जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

    लगने न दे बस हो तो उस के गौहर-ए-गोश को बाले तक
    उस को फ़लक चश्म-मह-ओ-ख़ुर की पुतली का तारा जाने है

    आगे उस मुतकब्बिर के हम ख़ुदा ख़ुदा किया करते हैं
    कब मौजूद ख़ुदा को वो मग़रूर-ए-ख़ुद-आरा जाने है

    आशिक़ सा तो सादा कोई और न होगा दुनिया में
    जी के ज़ियाँ को इश्क़ में उस के अपना वारा जाने है

    चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
    वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है

    मेहर ओ वफ़ा ओ लुत्फ़-ओ-इनायत एक से वाक़िफ़ इन में नहीं
    और तो सब कुछ तंज़ ओ किनाया रम्ज़ ओ इशारा जाने है

    क्या क्या फ़ित्ने सर पर उस के लाता है माशूक़ अपना
    जिस बे-दिल बे-ताब-ओ-तवाँ को इश्क़ का मारा जाने है

    रख़नों से दीवार-ए-चमन के मुँह को ले है छुपा यानी
    इन सुराख़ों के टुक रहने को सौ का नज़ारा जाने है

    तिश्ना-ए-ख़ूँ है अपना कितना 'मीर' भी नादाँ तल्ख़ी-कश
    दुम-दार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है
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    क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़
    जान का रोग है बला है इश्क़

    इश्क़ ही इश्क़ है जहाँ देखो
    सारे आलम में भर रहा है इश्क़

    इश्क़ है तर्ज़ ओ तौर इश्क़ के तईं
    कहीं बंदा कहीं ख़ुदा है इश्क़

    इश्क़ माशूक़ इश्क़ आशिक़ है
    यानी अपना ही मुब्तला है इश्क़

    गर परस्तिश ख़ुदा की साबित की
    किसू सूरत में हो भला है इश्क़

    दिलकश ऐसा कहाँ है दुश्मन-ए-जाँ
    मुद्दई है प मुद्दआ है इश्क़

    है हमारे भी तौर का आशिक़
    जिस किसी को कहीं हुआ है इश्क़

    कोई ख़्वाहाँ नहीं मोहब्बत का
    तू कहे जिंस-ए-ना-रवा है इश्क़

    'मीर'-जी ज़र्द होते जाते हो
    क्या कहीं तुम ने भी किया है इश्क़
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    फ़क़ीराना आए सदा कर चले
    कि म्याँ ख़ुश रहो हम दुआ कर चले

    जो तुझ बिन न जीने को कहते थे हम
    सो इस अहद को अब वफ़ा कर चले

    शिफ़ा अपनी तक़दीर ही में न थी
    कि मक़्दूर तक तो दवा कर चले

    पड़े ऐसे अस्बाब पायान-ए-कार
    कि नाचार यूँ जी जला कर चले

    वो क्या चीज़ है आह जिस के लिए
    हर इक चीज़ से दिल उठा कर चले

    कोई ना-उमीदाना करते निगाह
    सो तुम हम से मुँह भी छुपा कर चले

    बहुत आरज़ू थी गली की तिरी
    सो याँ से लहू में नहा कर चले

    दिखाई दिए यूँ कि बे-ख़ुद किया
    हमें आप से भी जुदा कर चले

    जबीं सज्दा करते ही करते गई
    हक़-ए-बंदगी हम अदा कर चले

    परस्तिश की याँ तक कि ऐ बुत तुझे
    नज़र में सभों की ख़ुदा कर चले

    झड़े फूल जिस रंग गुलबुन से यूँ
    चमन में जहाँ के हम आ कर चले

    न देखा ग़म-ए-दोस्ताँ शुक्र है
    हमीं दाग़ अपना दिखा कर चले

    गई उम्र दर-बंद-ए-फ़िक्र-ए-ग़ज़ल
    सो इस फ़न को ऐसा बड़ा कर चले

    कहें क्या जो पूछे कोई हम से 'मीर'
    जहाँ में तुम आए थे क्या कर चले
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    'मीर' के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो
    क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया
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    मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
    तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
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    नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
    पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
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