जब तुझे रिश्ते निभाने का हुनर आ जाएगा
    तेरा दुश्मन ख़ुद ही चलकर तेरे घर आ जाएगा
    Meraj Faizabadi
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    मुझ को सूली पे चढ़ाकर भी दुखी है दुनिया
    वो मेरी मौत नहीं आँखों में डर माँगती है
    Meraj Faizabadi
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    तेरे बारे में जब सोचा नहीं था
    मैं तन्हा था मगर इतना नहीं था

    तेरी तस्वीर से करता था बातें
    मेरे कमरे में आईना नहीं था

    समुंदर ने मुझे प्यासा ही रक्खा
    मैं जब सहरा में था प्यासा नहीं था

    मनाने रूठने के खेल में हम
    बिछड़ जाएँगे ये सोचा नहीं था

    सुना है बंद कर लीं उसने आँखें
    कई रातों से वो सोया नहीं था
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    Meraj Faizabadi
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    ज़िंदा रहना है तो हालात से डरना कैसा
    जंग लाज़िम हो तो लश्कर नहीं देखे जाते
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    बिखरे बिखरे सहमे सहमे रोज़-ओ-शब देखेगा कौन
    लोग तेरा जुर्म देखेंगे सबब देखेगा कौन

    हाथ में सोने का कासा ले के आए हैं फ़क़ीर
    इस नुमाइश में तिरा दस्त-ए-तलब देखेगा कौन

    ला उठा तेशा चटानों से कोई चश्मा निकाल
    सब यहाँ प्यासे हैं तेरे ख़ुश्क लब देखेगा कौन

    दोस्तों की बे-ग़रज़ हम-दर्दियाँ थक जाएँगी
    जिस्म पर इतनी ख़राशें हैं कि सब देखेगा कौन

    शाइरी में 'मीर'-ओ-'ग़ालिब' के ज़माने अब कहाँ
    शोहरतें जब इतनी सस्ती हों अदब देखेगा कौन
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    Meraj Faizabadi
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    हमीं को क़ातिल कहेगी दुनिया हमारा ही क़त्ल-ए-आम होगा
    हमीं कुएँ खोदते फिरेंगे हमीं पे पानी हराम होगा

    अगर यही ज़ेहनियत रही तो मुझे ये डर है कि इस सदी में
    न कोई अब्दुल हमीद होगा न कोई अब्दुल कलाम होगा
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    Meraj Faizabadi
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    किसी की मर्ज़ी को अपनी क़िस्मत बना चुके हैं
    हम अपने हाथों की सब लकीरें मिटा चुके हैं

    चलो समंदर की वुसअतों में सुकून ढूँढे
    कि साहिलों पर बहुत घरौंदें बना चुके हैं

    उन्हीं छतों से हमारे आँगन में मौत बरसी
    वही छतें जिन से हम पतंगें उड़ा चुके हैं
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    Meraj Faizabadi
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    मुझ को थकने नहीं देता ये ज़रूरत का पहाड़
    मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते
    Meraj Faizabadi
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    हमें पढ़ाओ न रिश्तों की कोई और किताब
    पढ़ी है बाप के चेहरे की झुर्रियाँ हम ने
    Meraj Faizabadi
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    ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना
    पाँव बख़्शें हैं तो तौफ़ीक़-ए-सफ़र भी देना

    गुफ़्तुगू तू ने सिखाई है कि मैं गूँगा था
    अब मैं बोलूँगा तो बातों में असर भी देना

    मैं तो इस ख़ाना-बदोशी में भी ख़ुश हूँ लेकिन
    अगली नस्लें तो न भटकें उन्हें घर भी देना

    ज़ुल्म और सब्र का ये खेल मुकम्मल हो जाए
    उस को ख़ंजर जो दिया है मुझे सर भी देना
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    Meraj Faizabadi
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