जो होती थी कभी ताक़त हमारी
उसे अब खा चुकी फ़ितरत हमारी
कि दरिया पार करके डूब जाना
है ऐसे साथ कुछ क़िस्मत हमारी
बिना माँगे जो तुमको मिल गए हैं
तुम्हें है क्या पता क़ीमत हमारी
हमारा फूल जब उसने कुबूला
तभी से आ गई शामत हमारी
वही इक कमरा, तन्हाई, उदासी
यही है अब तो बस दौलत हमारी
सुनो तुम राब्ता मत रक्खो हम सेे
सुनो अच्छी नहीं नीयत हमारी
जहाँ हम सेे ही सारी रौनकें थीं
वाँ ना-मंज़ूर है शिरकत हमारी
न हमको दर्द बतलाओ यूँँ अपना
है कब की मर गई शफ़क़त हमारी
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