बस ज़रा देर को बाग़ में बैठी वोपेड़ पौधे भी ग़ज़लें सुनाने लगेफूल भी ख़ास भाते न थे हम को परसाथ तुम थी तो काँटे सुहाने लगे— Alankrat Srivastava