देखना मीर कहूँगा मैं वो प्यारी ग़ज़लें
जिनको पलकों पे बिठा लेंगी तुम्हारी ग़ज़लें
जब ज़माने में कहीं दुख की दवाई न मिली
ज़ेहन में तब मेरे मालिक ने उतारी ग़ज़लें
अपनी दौलत पे या शोहरत पे न इतराओ तुम
तुम पे भारी न पड़ें शाह हमारी ग़ज़लें
जैसे बच्चे सभी माँ को है निहारे वैसे
देखती रहती हैं तुमको मेरी सारी ग़ज़लें
'उम्र के साथ बुढ़ापा तो मियाँ आना है
पर बचा लेंगी मेरे दिल की ख़ुमारी ग़ज़लें
कुछ बहानों के सहारे ही तो ज़िन्दा हूँ मैं
मेरा परिवार मेरे यार दुलारी ग़ज़लें
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