ये न सोचो रफ़ाक़त नहीं है
बस ग़रीबों की इज़्ज़त नहीं है
मालदारों से कह कर बताओ
हम को तुम से मुहब्बत नहीं है
जाने वाले मुझे साथ ले जा
मुझ को मेरी ज़रूरत नहीं है
उस ने लौटा दिया दिल ये कह कर
तेरा दिल कोई दौलत नहीं है
बद-दुआ भी नहीं दूँ मैं उस को
मुझ
में इतनी शराफ़त नहीं है
दिल का झुकना ज़रूरी है बंदे
सर झुकाना इबादत नहीं है
साथ दुनिया भी हो तब भी क्या है
गरचे तुझ से ही क़ुर्बत नहीं है
सच बताऊँ तो होंठों में तेरे
अब वो पहले सी लज़्ज़त नहीं है
मर्द होना भी कितना बुरा है
रोने की भी सहूलत नहीं है
मौत ही अब निकालेगी ग़म से
ज़िंदगी में ये क़ुव्वत नहीं है
— Anas Khan















