कौन समझे 'इश्क़ में बर्बाद का ग़म
मार देता है किसी की याद का ग़म
हिज्र में जब दर्द से वाक़िफ़ हुए हम
तब समझ आने लगा फ़रहाद का ग़म
बेड़ियाँ जिस दिन खुलीं ये जान लोगे
है असीरों से बड़ा आज़ाद का ग़म
फिर क़फ़स में लौट आओ ऐ परिंदों
यार समझो तो ज़रा सय्याद का ग़म
आपने तो जौन के बस शे'र देखे
आप समझे ही नहीं उस्ताद का ग़म
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