mahbooba kii shaan men akshar meraa likkha chaltaa hai | महबूबा की शान में अक्सर मेरा लिक्खा चलता है

  - Prashant Arahat

महबूबा की शान में अक्सर मेरा लिक्खा चलता है
शहर गली हर एक मुहल्ला मेरा चर्चा चलता है

उसके बारे में कुछ बोलूँ सब तैयार हैं सुनने को
मेरी बर्बादी का यानी हर इक मिसरा चलता है

अचरज से मैं देख रहा हूँ रंग बदलती दुनिया को
पहली बार किसी मेले में जैसे बच्चा चलता है

शाम ढले जब मेरी छत पर महफ़िल रोज़ जमा होती
ग़ज़लें नज्में चखना दारू फिर पैमाना चलता है

अरहत कैसे याद भुलाऊँ तुम तरकीब बताओ कुछ
यादों के चलचित्र में अब उसका अफ़साना चलता है

  - Prashant Arahat

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