महबूबा की शान में अक्सर मेरा लिक्खा चलता है
शहर गली हर एक मुहल्ला मेरा चर्चा चलता है
उसके बारे में कुछ बोलूँ सब तैयार हैं सुनने को
मेरी बर्बादी का यानी हर इक मिसरा चलता है
अचरज से मैं देख रहा हूँ रंग बदलती दुनिया को
पहली बार किसी मेले में जैसे बच्चा चलता है
शाम ढले जब मेरी छत पर महफ़िल रोज़ जमा होती
ग़ज़लें नज्में चखना दारू फिर पैमाना चलता है
अरहत कैसे याद भुलाऊँ तुम तरकीब बताओ कुछ
यादों के चलचित्र में अब उसका अफ़साना चलता है
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