जब कभी मैं ज़िंदगी का वक़्त पिछला देखती हूँ
मुझको अक्सर मैं किताबों में ही उलझा देखती हूँ
जिन पलों में मेरी माँ को मेरे पापा पीटते थे
उन पलों में मैं किनारे ख़ुद को रोता देखती हूँ
आरज़ू है ये न कोई जान पाए दर्द मेरे
इसलिए भी मैं हजारों बार शीशा देखती हूँ
एक नंबर से सफलता जब मेरी रुकती कभी है
मौत से पहले का मंज़र तब मैं तन्हा देखती हूँ
बे-मुरव्वत बे-हक़ीक़त जिसको लगती मेरी आँखें
उसका चेहरा फिर मैं चश्में में भी धुँधला देखती हूँ
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