तसुव्वर में मेरा जिस सेे तअल्लुक़ दिल्लगी का है
हक़ीक़त में उसी से वास्ता फिर दोस्ती का है
हमारी दास्ताँ में भँवरा है वो और मैं गुल हूँ
तो ज़ाहिर है कि वो मेरे अलावा भी किसी का है
मुझे उसकी ख़ताएँ इसलिए दिलचस्प लगती हैं
मुझे पकड़े हुए है एक जिन जो आशिक़ी का है
तरीक़े थे कई सारे उसे यूँँ रोक लेने के
मगर मेरे लिए तो मसअला उसकी ख़ुशी का है
समझती हूँ जिसे अपना उसी से फिर जुदा होना
लगे ऐसे कि लम्हा आख़िरी ये ज़िंदगी का है
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