तसुव्वर में मेरा जिस सेे तअल्लुक़ दिल-लगी का है
हक़ीक़त में उसी से वास्ता फिर दोस्ती का है
हमारी दास्ताँ में भँवरा है वो और मैं गुल हूँ
तो ज़ाहिर है कि वो मेरे अलावा भी किसी का है
मुझे उस की ख़ताएँ इस लिए दिलचस्प लगती हैं
मुझे पकड़े हुए है एक जिन जो आशिक़ी का है
तरीक़े थे कई सारे उसे यूँ रोक लेने के
मगर मेरे लिए तो मसअला उस की ख़ुशी का है
समझती हूँ जिसे अपना उसी से फिर जुदा होना
लगे ऐसे कि लम्हा आख़िरी ये ज़िंदगी का है
— Bhoomi Srivastava















