Moin Ahmed "Aazad"

Moin Ahmed "Aazad"

@moin_ahmed

Moin Ahmed "Aazad" shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Moin Ahmed "Aazad"'s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हूरों के जैसी है वो क़िस्से कहानियों की क्या क्या कहूँ मैं तुम सेे अब क्या मेरा सनम है — Moin Ahmed "Aazad"
कुछ दिनों से नज़र नहीं आया चाँद किन बादलों में उलझा है — Moin Ahmed "Aazad"
मजबूरी ही, बाज़ीगर की हिम्मत है रस्सी पर चलते हैं, ध्यान सँभाले हम — Moin Ahmed "Aazad"
आज़ाद हूँ मैं ठीक से पहचानिए मुझे बे-चेहरगी का आप की चेहरा रहा हूँ मैं — Moin Ahmed "Aazad"
है हाल जो भी जैसा भी अब ठीक है मैं मर गया, अपनी कहो सब ठीक है — Moin Ahmed "Aazad"
है रफ़ूगर याँ कोई बताओ ज़रा तो चाक-दामन अजी ख़ुद सिए जा रहा हूँ — Moin Ahmed "Aazad"
क़िस्सा-ए-ग़म सुनाते हुए रो पड़ा मुस्कुराते हुए — Moin Ahmed "Aazad"
इक ख़्वाब देखता हूँ मैं आज़ाद रोज़ो-शब महफूज़ हैं वतन की मेरे बेटियाँ तमाम — Moin Ahmed "Aazad"
मैं चाहता था कि वो दौड़ कर लिपट जाए कभी दिखे ही नहीं उस को मेरे हाथ खुले — Moin Ahmed "Aazad"
काश कोई ग़ज़ल तो ऐसी हो वो जो बिल्कुल तुम्हारे जैसी हो — Moin Ahmed "Aazad"
ग़मनाक मैं, बे-साज़ मैं, बर्बाद मैं ऐ दोस्त तू ख़ुश है अगर तब ठीक है — Moin Ahmed "Aazad"

Ghazal

तन्हाई ही तन्हाई है, मौला ख़ैर करे ख़ाना-ए-दिल पर जो छाई है, मौला ख़ैर करे जानाँ तेरी यादों में अब अश्क बहाने की फिर ये आँख तमन्नाई है, मौला ख़ैर करे ज़ख़्म-ए-दिल है, मैं हूँ, और उदासी है हर-सू अब जान मेरी घबराई है मौला ख़ैर करे तेरी राहें तकते-तकते, मेरी आँखों की बुझने पर अब बीनाई है, मौला ख़ैर करे हाल न पूछा, उस ने मेरी ज़र्द तबीअत का यार भी मेरा हरजाई है, मौला ख़ैर करे मेरे सर इल्ज़ाम लगे हैं, तर्क-ए-उल्फत के मेरे हिस्से रुसवाई है, मौला ख़ैर करे याँ तो वो ही मुंसिफ़ भी है और क़ातिल भी है ज़ेर ए अदालत सुनवाई है, मौला ख़ैर करे बीमार-ए-उल्फ़त हूँ मैं आज़ाद, मगर ख़ुश हूँ, उस की हिम्मत-अफ़ज़ाई है, मौला ख़ैर करे — Moin Ahmed "Aazad"
इन हसरतों की लाश को दफ़ना रहा हूँ मैं ऐ ज़िन्दगी क़रीब तेरे आ रहा हूँ मैं दुश्मन भी हो तो हँस के लगाऊँ उसे गले तन्हाइयों से इस क़दर उक्ता रहा हूँ मैं नज़रें चुराके मुझ सेे निकलते हैं बा-ख़ुदा फ़ित्नागरों की आँख का काँटा रहा हूँ मैं आवारगी न काम कुछ आएगी बे-शऊर खाना-ब-दोश दिल को ये समझा रहा हूँ मैं रोती रही है चश्मे-पुर-उम्मीद निस्फ़ शब पहरों तेरे ख़याल से उलझा रहा हूँ मैं आएँगे लौट आएँगे वो एक दिन ज़रूर झूठी तसल्लियों से जी बहला रहा हूँ मैं आज़ाद हूँ मैं ठीक से पहचानिए मुझे बे-चेहरगी का आप की चेहरा रहा हूँ मैं — Moin Ahmed "Aazad"
बस इक यही रिश्ता निभाना है मुझे अब उस की हाँ में हाँ मिलाना है मुझे देखे नहीं थे ख़्वाब मैं ने वस्ल के दिल हिज्र के लाइक़ बनाना है मुझे उस के लबों पर सेहरा की बातें हैं सो मजनू सिफ़त ख़ुद को बनाना है मुझे वो संग दिल है ये सभी को है ख़बर है मोम लहजा ये बताना है मुझे क्या रेल से आवाज़ देता है कोई क्या पटरियों पर लेट जाना है मुझे उस सेे वफ़ा की अब तवक़्क़ो भी नहीं अब ज़ख़्म दिल का ख़ुद छुपाना है मुझे दिल को अज़ाखाना बनाना है मेरे अब सोग यूँँ उस का मनाना है मुझे मोईन उस को तो तमाशे भाते हैं अंगारों की बारिश में आना है मुझे — Moin Ahmed "Aazad"
मंदी में, महँगा सामान सँभाले हम बैठे हैं, दिल में अरमान सँभाले हम आँखों में सैलाब की, गर्दिश जारी है और सीने में, हैं तूफ़ान सँभाले हम होंठों पर मुस्कान सजाए, बैठे हैं कितने होंठों की मुस्कान सँभाले हम उल्फ़त के बाज़ार, में बेची बीनाई लौटे हैं, फिर भी नुक़सान सँभाले हम क़स्र मुबारक़ हो तुम को ये ख़ुशियों का अच्छे से हैं, दिल वीरान सँभाले हम मजबूरी ही, बाज़ीगर की हिम्मत है रस्सी पर चलते हैं, ध्यान सँभाले हम मतलब की इस दुनिया में भी जीते हैं जैसे-तैसे, अपनी जान सँभाले हम ज़र्द हुए पत्तों की क़िस्मत क्या आख़िर टूट गए शाख़ों का मान, सँभाले हम उस के कूचे में हर शख़्स ख़ुदा था सो लौट आए अपनी औसान सँभाले हम मज़लूमों की चीख़ें सुनते हैं 'आज़ाद' बहरों की बस्ती में, कान सँभाले हम — Moin Ahmed "Aazad"
उल्फ़त की चोट आहो फ़ुग़ाँ सिसकियाँ तमाम वो मेरे नाम कर गए बेचैनियाँ तमाम ज़ेहन और जिगर में जब भी मचलते हैं ज़लज़ले तंग आ के चीख़ पड़तीं हैं ख़ामोशियाँ तमाम रक्खेंगे कब तलक मुझे यूँँ ही क़तार में सुन लीजिए हुज़ूर मेरी अर्ज़ियाँ तमाम नफ़रत को अपने क़ल्ब से बाहर निकालिए दरिया में फेंक आइए ये बर्छियाँ तमाम फूलों में तेरा रंग, हवाओं में है महक जलवों में तेरे जज़्ब हैं रानाइयाँ तमाम शायद अभी भी आप को फ़ुर्सत नहीं मिली रक्खी हैं ताक़चे पे मेरी चिट्ठियाँ तमाम मैं ने जो इक शजर की हिफ़ाज़त सँभाल ली मेरे ही सम्त हो गईं फिर आँधियाँ तमाम इक ख़्वाब देखता हूँ मैं आज़ाद रोज़ो-शब महफूज़ है वतन की मेरे बेटियाँ तमाम — Moin Ahmed "Aazad"
अगरचे हुस्न कभी तेरी हम पे ज़ात खुले हमारे सामने असरारे-कायनात खुले यक़ीनन एक दिन उस पर गुज़र के देखेंगे कभी जो अर्ज़-ए-तमन्ना का पुलसिरात खुले न जाने कितने ही दिल मुंतज़र खड़े हैं यहाँ लबों पे उस के दबी है अभी जो बात खुले कई बरस से मुक़फ़्फ़ल थीं ख़्वाहिशें दिल में मुख़ातब आप के, ये बाबे-ख़्वाहिशात खुले कोई तो पुख़्ता वसीला हो मेरे चारा-गर गिरह दिलों की खुले तो न बे-सबात खुले मैं चाहता था कि वो दौड़ कर लिपट जाए कभी दिखे ही नहीं उस को मेरे हाथ खुले तुम्हारे हुस्न की हरकत कोई, न ज़ाया' हो तुम्हारी ज़ुल्फ़, मेरी चश्म साथ-साथ खुले ग़मों की क़ैद में आज़ाद फँस गया हूँ मैं कभी तो काश कोई सूरते-निजात खुले — Moin Ahmed "Aazad"
साहिबे-क़ल्ब मैं हर-आन तुम्हें चाहूँगा मैं तो मर के भी मेरी जान तुम्हें चाहूँगा मैं कोई तूर का परबत नहीं जो जल जाऊँ मैं तो हूँ कर्ब का मैदान, तुम्हें चाहूँगा कोई दुनिया तो नहीं मैं कि भुला दूँ तुम को हूँ मुहब्बत का निगहबान तुम्हें चाहूँगा ख़ाक भी मेरी करेगी ये तवाफ़े-उल्फ़त हो के इस इश्क़ में क़ुर्बान, तुम्हें चाहूँगा तुम भले आँख से आँसू सा बहा दो मुझ को फिर भले कर दो बयाबान तुम्हें चाहूँगा मौत आए तो चली आए कोई ख़ौफ़ नहीं है मेरा आख़िरी अरमान तुम्हें चाहूँगा क्यूँ न आज़ाद ये दुनिया भी बने अब दुश्मन हो भले चाक गिरेबान तुम्हें चाहूँगा — Moin Ahmed "Aazad"