in hasraton ki laash ko dafna raha hooñ main | इन हसरतों की लाश को दफ़ना रहा हूँ मैं

  - Moin Ahmed "Aazad"

इन हसरतों की लाश को दफ़ना रहा हूँ मैं
ऐ ज़िन्दगी क़रीब तेरे आ रहा हूँ मैं

दुश्मन भी हो तो हँस के लगाऊँ उसे गले
तन्हाइयों से इस क़दर उक्ता रहा हूँ मैं

नज़रें चुराके मुझ सेे निकलते हैं बा-ख़ुदा
फ़ित्नागरों की आँख का काँटा रहा हूँ मैं

आवारगी न काम कुछ आएगी बे-शऊर
खाना-ब-दोश दिल को ये समझा रहा हूँ मैं

रोती रही है चश्मे-पुर-उम्मीद निस्फ़ शब
पहरों तेरे ख़याल से उलझा रहा हूँ मैं

आएँगे लौट आएँगे वो एक दिन ज़रूर
झूठी तसल्लियों से जी बहला रहा हूँ मैं

आज़ाद हूँ मैं ठीक से पहचानिए मुझे
बे-चेहरगी का आपकी चेहरा रहा हूँ मैं

  - Moin Ahmed "Aazad"

Aawargi Shayari

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