तेरे लिए ये जान भी क़ुर्बान है
मेरी ग़ज़ल का बस तू ही उनवान है
समझी नहीं उस ने ये बातें अन-कही
मासूम है कितनी सनम नादान है
मैं सोचता हूँ सब ख़यालों में तुझे
जाऊँ जहाँ बस तेरा ही गुन-गान है
सब नाम से तेरे बुलाते हैं मुझे
अब नाम तेरा ये मेरी पहचान है
आ जा ऐ जान-ए-जाँ न तड़पा यूँ मुझे
ये मेरा घर तेरे बिना सुनसान है
"मोईन" को अच्छा कहो चाहे बुरा
इस के लबों पे हर घड़ी मुस्कान है
— Moin Ahmed "Aazad"















