उल्फ़त की चोट आहो फ़ुग़ाँ सिसकियाँ तमाम

वो मेरे नाम कर गए बेचैनियाँ तमाम

ज़ेहन और जिगर में जब भी मचलते हैं ज़लज़ले
तंग आ के चीख़ पड़तीं हैं ख़ामोशियाँ तमाम

रक्खेंगे कब तलक मुझे यूँ ही क़तार में
सुन लीजिए हुज़ूर मेरी अर्ज़ियाँ तमाम

नफ़रत को अपने क़ल्ब से बाहर निकालिए
दरिया में फेंक आइए ये बर्छियाँ तमाम

फूलों में तेरा रंग, हवाओं में है महक
जलवों में तेरे जज़्ब हैं रानाइयाँ तमाम

शायद अभी भी आप को फ़ुर्सत नहीं मिली
रक्खी हैं ताक़चे पे मेरी चिट्ठियाँ तमाम

मैं ने जो इक शजर की हिफ़ाज़त सँभाल ली
मेरे ही सम्त हो गईं फिर आँधियाँ तमाम

इक ख़्वाब देखता हूँ मैं आज़ाद रोज़ो-शब
महफूज़ है वतन की मेरे बेटियाँ तमाम

— Moin Ahmed "Aazad"

More by Moin Ahmed "Aazad"

Other ghazal from the same pen

See all from Moin Ahmed "Aazad" →

Samundar Shayari

Shers of samundar.

All Samundar Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling