साहिबे-क़ल्ब मैं हर-आन तुम्हें चाहूँगा
मैं तो मर के भी मेरी जान तुम्हें चाहूँगा
मैं कोई तूर का परबत नहीं जो जल जाऊँ
मैं तो हूँ कर्ब का मैदान, तुम्हें चाहूँगा
कोई दुनिया तो नहीं मैं कि भुला दूँ तुमको
हूँ मुहब्बत का निगहबान तुम्हें चाहूँगा
ख़ाक भी मेरी करेगी ये तवाफ़े-उल्फ़त
हो के इस 'इश्क़ में क़ुर्बान, तुम्हें चाहूँगा
तुम भले आँख से आँसू सा बहा दो मुझको
फिर भले कर दो बियाबान तुम्हें चाहूँगा
मौत आए तो चली आए कोई ख़ौफ़ नहीं
है मेरा आख़िरी अरमान तुम्हें चाहूँगा
क्यूँ न आज़ाद ये दुनिया भी बने अब दुश्मन
हो भले चाक गिरेबान तुम्हें चाहूँगा
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