पंख कतर कर मुझ को दिलबर फेंक दिया

अंबर से धरती पे ला कर फेंक दिया

मैं तो था आबाद नशेमन पर तुम ने
ज़ीस्त को मेरी कर के बंजर फेंक दिया

अपने आप को रौशन कर के फिर उस ने
तीली सा मुझ को सुलगाकर फेंक दिया

झोली फैलाई, फूलों की ख़ाहिश में
मेरी सम्त उठा कर पत्थर फेंक दिया

पहले प्यार जताया मुझ पर ख़ूब उस ने
फिर ज़ालिम ने मुझ पर, ख़ंजर फेंक दिया

आप की इज़्ज़त की ख़ातीर देखो हम ने
अपने सर का ताज ज़मीं पर फेंक दिया

तुम ने जब ऐलान-ए-जंग किया, हम ने
अपने तन से खींच के बख्तर फेंक दिया

— Moin Ahmed "Aazad"

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