अगरचे हुस्न कभी तेरी हम पे ज़ात खुले

हमारे सामने असरारे-कायनात खुले

यक़ीनन एक दिन उस पर गुज़र के देखेंगे
कभी जो अर्ज़-ए-तमन्ना का पुलसिरात खुले

न जाने कितने ही दिल मुंतज़र खड़े हैं यहाँ
लबों पे उस के दबी है अभी जो बात खुले

कई बरस से मुक़फ़्फ़ल थीं ख़्वाहिशें दिल में
मुख़ातब आप के, ये बाबे-ख़्वाहिशात खुले

कोई तो पुख़्ता वसीला हो मेरे चारा-गर
गिरह दिलों की खुले तो न बे-सबात खुले

मैं चाहता था कि वो दौड़ कर लिपट जाए
कभी दिखे ही नहीं उस को मेरे हाथ खुले

तुम्हारे हुस्न की हरकत कोई, न ज़ाया' हो
तुम्हारी ज़ुल्फ़, मेरी चश्म साथ-साथ खुले

ग़मों की क़ैद में आज़ाद फँस गया हूँ मैं
कभी तो काश कोई सूरते-निजात खुले

— Moin Ahmed "Aazad"

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