दर्दो-अलम की भूख बदन से निचोड़ के

ये जिस्म मेरा आख़री चादर न ओढ़ ले

आ इस से क़ब्ल रूह बदल डाले आशियाँ
दिल फिर कहीं उमीद से रिश्ता न तोड़ ले

करता नहीं मैं ज़िक़्र भी हालाते-हाल का
फिर तू नदामतों के सबब सर न फोड़ ले

ऐसा न हो मैं छोड़ के दुनिया तुझे मिलूँ
ऐसा न हो कि तू भी कहीं मुँह ही मोड़ ले

कह दे तो मैं दिखा दूँ तुझे दिल के आबले
घबरा के फिर न तू कहीं भौहें सिकोड़ ले

दो-चार ग़म से हो के अब वो आईना-सिफ़त
ख़ुद को न बरहमी में कहीं तोड़ फोड़ ले

आज़ाद टूट जाए न साँसों का सिलसिला
किस ने कहा था उस को तू साँसों से जोड़ ले

— Moin Ahmed "Aazad"

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