कभी मुझ को खनकती चूड़ियाँ दुश्मन सी लगती हैं
तुम्हें सुनते हुए सब बोलियाँ दुश्मन सी लगती हैं
भले इक दो क़दम के फ़ासले पे तुम खड़े हो पर
मुझे इतनी भी तुम से दूरियाँ दुश्मन सी लगती हैं
तुम्हारे इर्द दुनिया ख़ूबसूरत है मगर मुझ को
तुम्हारे पास बैठी लड़कियाँ दुश्मन सी लगती हैं
मुझे सत्तर बरस के वक़्त भी सुंदर ही कहना तुम
हसीनाओं को उस पल झुर्रियाँ दुश्मन सी लगती हैं
पसंदीदा हो जितनी भी तुम्हारी आँखें मुझ को पर
नज़र-अंदाज़ करती पुतलियाँ दुश्मन सी लगती हैं
तुम्हारे बिन नज़ारों की नुमाइश भी नहीं होती
तुम्हारे बिन ये नदियाँ घाटियाँ दुश्मन सी लगती हैं
As you were reading Shayari by Bhoomi Srivastava
our suggestion based on Bhoomi Srivastava
As you were reading undefined Shayari