jism ko raund ke us waqt qahar jaata hai | जिस्म को रौंद के उस वक़्त क़हर जाता है

  - Shadab Asghar

जिस्म को रौंद के उस वक़्त क़हर जाता है
'इश्क़ जब सामने आँखों के मुकर जाता है

बस यही कह के मैंने दिल को तसल्ली दी है
जिसको जाना नहीं होता है ठहर जाता है

मेरे बदले हुए लहज़े से शिकायत कैसी
बाद इक 'उम्र के हर शख़्स सुधर जाता है

अस्ल मसला तो मियाँ रात की बेदारी है
दिन तो दफ़्तर की ही बाहों में गुज़र जाता है

अब तो हर शख़्श में उम्मीद ए वफ़ा ढूंढता हुँ
जिसका अपना कोई होता है किधर जाता है

  - Shadab Asghar

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