तेरे बग़ैर मुझ को भला क्या दिखाई दे
तू साथ हो तो शहर ये अच्छा दिखाई दे
ये लोग ये फ़ज़ा ये दर-ओ-बाम सब हैं पर
मुमकिन नहीं कि कोई जो तुझ सा दिखाई दे
सारे ख़याल ख़ुद-कुशी के छोड़ दूँगा मैं
जो ख़्वाब में भी मुझ को तू मेरा दिखाई दे
हम आशिक़ों की बस यही ख़्वाहिश रही है अब
हम को तमाम उम्र ये चेहरा दिखाई दे
— Kumar gyaneshwar















