किसी ज़िंदान से महबूब को ख़त लिख रहा है
सियासत की ख़ुशामद को जो बैअत लिख रहा है
अज़िय्यत से भरी दुनिया की हसरत लिख रहा है
वो नफ़रत की हथेली पर मोहब्बत लिख रहा है
कहीं सूली पे लटका दे न ये दुनिया उसे जो
ख़ुदा की मोजिज़ा कारी को औरत लिख रहा है
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