दिन अलग होते रात होती कुछ और
वस्ल में ये हयात होती कुछ और
'इश्क़ में अब नहीं हया वरना
'इश्क़ की काएनात होती कुछ और
'इश्क़ होता नहीं न जाँ जाती
मरते भी तो वफ़ात होती कुछ और
जानते गर कि 'इश्क़ जाँ लेगा
'इश्क़ से एहतियात होती कुछ और
तू नहीं है तो ज़िक्र है तेरा
तेरे होने से बात होती कुछ और
गर जो पढ़ती तू भी मेरी ग़ज़लें
फिर सुख़न की बिसात होती कुछ और
उस को मैं बस पसंद था "जाज़िब"
प्यार में तो सिफ़ात होती कुछ और
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