घर चलाने के लिए क्या बन गया
सोने से मैं कोई काँसा बन गया
दोस्ती में इश्क़ भी होने लगा
रस्ते में इक और रस्ता बन गया
ग़म ने इतनी बार तोड़ा है मुझे
मुझ को लगता है मैं धागा बन गया
हुस्न पे इतराता था दरिया बहुत
इस क़दर सूखा कि गड्ढा बन गया
— Meem Alif Shaz















