जिसे ना-क़ाबिल-ए-बरदाश्त हों ये मुश्किलें उसकी
भला कैसे सहेगा एक पल भी नफ़रतें उसकी
ख़ुदा मुझ को अता कर धूप जो है उस के हिस्से में
बना ठंडी हवाऍं और सारी बारिशें उसकी
सलामत गर चमक चाहे तू अपने चाँद तारों में
तो इन को बोल दे मौला कि ये जानिब झुकें उसकी
ख़जिल कोयल भी हो जाए अगर आवाज़ सुन ले तो
हवाऍं भी महक जाएँ अगर ज़ुल्फ़ें उड़ें उसकी
ख़ुदा तू छीन ले सबकुछ मेरा बदले में दे मुझ को
फ़क़त क़ुर्बत शरारत और सारी ख़्वाहिशें उसकी
मैं यूँॅं हीं जागता था रात भर फिर याद आया ये
ये तकिया एक दिन रक्खा हुआ था गोद में उसकी
As you were reading Shayari by Kanha Mohit
our suggestion based on Kanha Mohit
As you were reading undefined Shayari