सितम ये महबूब पे भी यक़ीनन बरपा तो होगा
जुदाई के बाद मिलने कि ख़ातिर तड़पा तो होगा
तुझे अपनाने की चाहत लिए फिरते हैं दिवाने
रक़ीबों से तेरी ख़ातिर मुसलसल झगड़ा तो होगा
मुकम्मल करते थे इक दूसरे को जो साथ रहकर
जुदा होंगे तो रक़ीबों में बेशक चर्चा तो होगा
उधारी पर उसकी कब तक चलेंगी साँसें ये मेरी
जुदाई के बाद साँसों का मेरी ख़र्चा तो होगा
दुआ ख़ुश रहने की हो इब्तिदास जिस आदमी की
वो अंजाम-ए-ज़िन्दगी से यक़ीनन डरता तो होगा
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