इक मेरे बुलाने से सर-ए-बाम न आती
तरक़ीब मिलन की किसी भी काम न आती
जिसने न कसर बाक़ी निभाने में हो रक्खी
हिस्से वफ़ा उन आशिक़ों के नाम न आती
बंदिश यही वा'दा वो निभाने में मुसलसल
है आरज़ू मिलने की मगर शाम न आती
नाराज़गी में राज़ बता डाले वगरना
सोहबत की निहाँ बात सर-ए-आम न आती
रुतबा तो हमारा भी कोई कम नहीं वर्ना
दूजे के कहे से तो वो दो गाम न आती
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