yaar main chupchaap hi ab ke yahaañ par to rahoonga | यार मैं चुपचाप ही अब के यहाँ पर तो रहूँगा

  - Lalit Mohan Joshi

यार मैं चुपचाप ही अब के यहाँ पर तो रहूँगा
मैं ज़मीं को आसमाँ से एक दिन मिलवा ही लूँगा

जो उगलते जा रहे हैं रोज़ पत्थर मेरी ख़ातिर
देखना मैं नींव सुंदर से महल की ही रखूँगा

यार गर वो हैं यहाँ पर बेवफ़ा तो क्या मगर फिर
मैं तो अपनी यूँँ वफ़ा के दायरे में ही रहूँगा

वो मुसलसल ही रुलाता है मुझे हर दिन यहाँ तो
मैं नहीं उसकी कोई भी चोट फिर से अब सहूँगा

चाँद तारे ये ज़मीं ये आसमाँ बोला मगर फिर
आस्तीं का साँप अब मैं यार उसको ही कहूँगा

छोड़कर वो घर को मेरे क्या गया है मैं मगर अब
उसके ख़ातिर बंद दरवाज़े हमेशा ही रखूँगा

साथ ग़ैरों के रहे वो मुझको इस सेे क्या मगर फिर
अब ख़यालों से किनारा भी यहीं हर रोज़ दूँगा

चीर कर मैं अब अँधेरे को यहाँ पर दोस्तों फिर
यार सारे ही ज़मीं में रौशनी को मैं करूँँगा

  - Lalit Mohan Joshi

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