इन चश्म से पर्दा हटाकर भी हक़ीक़त देखना

हर मुस्कुराते शख़्स के छुपते अज़िय्यत देखना

हम भी बड़े तूफ़ान से गुज़रे हैं दिल था
में हुए
हम को भी इस्तेजाब है ख़ुद को सलामत देखना

हर बाप की पहली नसीहत होती है औलाद को
सब शौक़ रखना बा'द में पहले ज़रूरत देखना

तुम शहर में बेशक बनाना आठ दस शाही मकाँ
लेकिन पलट कर गाँव की टूटी इमारत देखना

जिस रोज़ उस चर्ख़-ए-फ़लक से लौटने का दिल करे
मेरी लहद के पास आने के वसालत देखना

— Nikhil Tiwari 'Nazeel'

More by Nikhil Tiwari 'Nazeel'

Other ghazal from the same pen

See all from Nikhil Tiwari 'Nazeel' →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling