इन चश्म से पर्दा हटाकर भी हक़ीक़त देखना
हर मुस्कुराते शख़्स के छुपते अज़िय्यत देखना
हम भी बड़े तूफ़ान से गुज़रे हैं दिल था
में हुए
हम को भी इस्तेजाब है ख़ुद को सलामत देखना
हर बाप की पहली नसीहत होती है औलाद को
सब शौक़ रखना बाद में पहले ज़रूरत देखना
तुम शहर में बेशक बनाना आठ दस शाही मकाँ
लेकिन पलट कर गाँव की टूटी इमारत देखना
जिस रोज़ उस चर्ख़-ए-फ़लक से लौटने का दिल करे
मेरी लहद के पास आने के वसालत देखना
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