कभी आवाज़ देकर या इशारों से
हम अक्सर बात करते हैं शरारों से
महल पे टाँग दीजे दिल रक़ीबों का
कि बस पहचान हो जाए मनारों से
कभी तो मौत को देखूँ दरीचों पर
कभी तो दिल भरे दिलकश नज़ारों से
उड़ा दी है ग़लत अफ़वाह लहरों ने
कि हमने सिल दिए दरिया किनारों से
ख़ुदा ने जंग भी तहरीम कर दी है
वगरना लड़ पड़े थे हम हज़ारों से
मुझे उस क़ाफ़िले के साथ जाना है
मगर कैसे छुड़ाऊँ हाथ यारों से
सफ़र से थक गया हूँ आँख लगती है
मैं पूछूँगा तिरा रस्ता सितारों से
As you were reading Shayari by Nikhil Tiwari 'Nazeel'
our suggestion based on Nikhil Tiwari 'Nazeel'
As you were reading undefined Shayari