अब भी क़िस्सों की फ़साने की तलब रहती है
तेरे होते भी ज़माने की तलब रहती है
वो तो हर बात मुझे सच ही बता देता है
मुझको इस पर भी बहाने की तलब रहती है
मुझको वैसे भी मुहब्बत नहीं मिलती है कहीं
उसको भी प्यार जताने की तलब रहती है
हम तुझे भीड़ में कुछ ऐसे तलाशे हैं शजर
जैसे तीरों को निशाने की तलब रहती है
As you were reading Shayari by Praveen Sharma SHAJAR
our suggestion based on Praveen Sharma SHAJAR
As you were reading undefined Shayari