अगर क़ैदी तमन्ना-ए-रिहाई छोड़ देता है
ख़ुदा भी उस के हक़ में फिर भलाई छोड़ देता है
यही अंजाम होता है उसे पा लेने का अक्सर
उसे पा ले अगर बन्दा कमाई छोड़ देता है
ज़रूरत बंदों को उन के घरों से दूर करती है
वगरना कौन सर्दी में रज़ाई छोड़ देता है
नुमाइश कौन करता है ग़मों की बर-सर-ए-महफ़िल
फ़क़त मय-ख़ाने में बंदा ख़ुदाई छोड़ देता है
उसे मिलना नहीं आता उसे जाना नहीं आता
चला जाता है ख़ुद वो पर रज़ाई छोड़ देता है
'शजर' तुम को मुहब्बत ही नहीं आती वगरना क्यूँ
हर इक महबूब तुम पर ही जुदाई छोड़ देता है
— Praveen Sharma SHAJAR















