मैं अपने शे'र जीना चाहता हूँ
सुरा अब सच में पीना चाहता हूँ
लगा है 'इश्क़ इक मरियम का जब से
मैं पंडित भी मदीना चाहता हूँ
तू अच्छा है मेरा तू दोस्त मत बन
मैं अपना सा कमीना चाहता हूँ
मैं जिस में चार दिन तनख़्वाह पाऊँ
कोई ऐसा महीना चाहता है
मेरी चाहत है उसका दिल पसीजे
मैं पत्थर में पसीना चाहता हूँ
नहीं है डर मगर मरने से पहले
मैं इक दिन खुल के जीना चाहता हूँ
मुलाज़िम हूँ किसी दफ़्तर का मैं भी
'शजर' मैं भी सरीना चाहता हूँ
Read Full