ham apne shor se baisaakhiyaan banaate hain | हम अपने शोर से बैसाखियाँ बनाते हैं

  - Raj

हम अपने शोर से बैसाखियाँ बनाते हैं
वो हैं कि ख़ामुशी को सीढ़ियाँ बनाते हैं

वो मान बैठते हैं इक जज़ीरे को दुनिया
जो साहिलों से परे कश्तियाँ बनाते हैं

ये सर्दी उनके लिए करनी है दुआ मुझको
जो लोग गर्मियों में कुल्फियाँ बनाते हैं

हमारी सिसकियाँ ही फ़ासला बनाती हैं
हमारे फ़ासले ही सिसकियाँ बनाते हैं

चुनिंदा दोस्त हैं और वो भी धोके से सच्चे
गरेबाँ के लिए ये खिड़कियाँ बनाते हैं

बस एक दिल की ज़रूरत है हादसे के लिए
हजर हों दो तो ही चिंगारियाँ बनाते हैं

वो सब सेे पहला लकड़हारा कौन होगा गर
शजर को काट के कुल्हाड़ियाँ बनाते हैं

बड़ी अजीब रिवायत है शहर की तेरे
जो साँप पालते हैं , लाठियाँ बनाते हैं

कहाँ पे रह गई बरसात से ज़मीं महरूम
ये अब्र इसलिए तो बिजलियाँ बनाते हैं

किसी बहाने से नज़दीकियाँ करी जाएँ
हम एक काम करें , दूरियाँ बनाते हैं

  - Raj

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