पढ़ा लिखा हो जो आशिक़ उसे सहूलत है
लुग़त में भी लिखा है लत के पहले उल्फ़त है
मैं क्यूँँ करूँँ गिला हिजरत से तेरे मेरी जाँ
ये मेरे पास तिरी आख़िरी अमानत है
बग़ैर पैर के तस्वीर में बनाऊँ तुम्हें
कि छोड़ के चले जाने की तुमको आदत है
अगरचे झूठी क़सम खाने से कोई मरता
तुम्हारे हिज्र की सौ मुझको तुम सेे नफ़रत है
मैं फ़ातिहा मिरी ख़ुशियों का पढ़ लूँ क्या मिरे दोस्त
या तुमको मुझ सेे अभी भी कोई शिकायत है
तिरा नक़ाब मिरे सामने कभी तो खुले
जो अब्र सागरों पे बरसे उनपे लानत है
तू आँसू पोछ गरेबाँ तो छोड़ बात तो मान
मैं अपनी बात भी रख लूँ अगर इजाज़त है
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