Raj
Raj
Ghazal

पढ़ा लिखा हो जो आशिक़ उसे सहूलत है

लुग़त में भी लिखा है लत के पहले उल्फ़त है

मैं क्यूँ करूँ गिला हिजरत से तेरे मेरी जाँ
ये मेरे पास तिरी आख़िरी अमानत है

बग़ैर पैर के तस्वीर में बनाऊँ तुम्हें
कि छोड़ के चले जाने की तुम को आदत है

अगरचे झूठी क़सम खाने से कोई मरता
तुम्हारे हिज्र की सौ मुझ को तुम से नफ़रत है

मैं फ़ातिहा मिरी ख़ुशियों का पढ़ लूँ क्या मिरे दोस्त
या तुम को मुझ से अभी भी कोई शिकायत है

तिरा नक़ाब मिरे सामने कभी तो खुले
जो अब्र सागरों पे बरसे उनपे लानत है

तू आँसू पोछ गरेबाँ तो छोड़ बात तो मान

मैं अपनी बात भी रख लूँ अगर इजाज़त है

— Raj

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